Posts

Showing posts with the label Zindagi

सवाल करने वाले को न रोकें और न ही उन्हें नफरत से देखें!

Image
स्कूल के दिनों में कक्षा में सवाल करना बुद्धिमानी की निशानी मानी जाती थी. आप ज्यादा सवाल करते हो तो अध्यापिका को और सभी बड़े-बुज़ुर्गों को लगता था के बच्चा जिज्ञासी है और ऐसे छात्र को हर कोई तारीफों के पुल पर खड़ा कर देता था. वोही सवाल जब आप अपने सरकार से, उसकी अर्थ-व्यवस्था से करे तो उसे आंतकवादी, देशद्रोही, तो अब नया सुना है 'अर्बन नक्सल ' का नाम करार दिया जाता है. इंसान को हर किसी अर्थ-व्यवस्था से सवाल करने का हक़ होना चाहिए, चाहे फिर वो उनके दफ्तर में हों, या समाज में! सवाल - जवाब से जानकारी बढ़ती है, मानसिक विकास होता है, चुनौती को गले लगाते हैं हम, अपने प्रयासों को देखने का, अपनी नाकामियाबी  को समझने का अवसर प्राप्त होता है  और अगर किसी सवाल का जवाब न भी मिले तब भी सवाल करना बंद नहीं होना चाहिए !  हर सवाल का जवाब न हों मगर हर सवाल हम सब को सोचने पर मजबूर कर देना चाहिए क्यूंकि तय मानसिकता हमें विकास करने से रोकती है ! हर देश का विकास उसमें बसने वाले लोगों से है, जनता से है ! ऐसे में जनता को सवाल पूछना बंद नहीं करना चाहिए और जब ऐसी अर्थ-व्यवस्था हमें सवाल करने से रोकत...

क्यों स्त्री को आम इंसान नहीं माना जाता?

Image
समाज में स्त्री को देखने का नजरिया बहुत ही सरंचित है ! या तो स्त्री को एक घरेलु हुलिए में बंद कर दिया जाता है जिसे हर कोई कांच के डिब्बे में बंद करके घूरता है या फिर स्त्री को शारीरिक तौर पर एक दर्शन मात्र वस्तु की भांति उसे कांच की बोतल में बंद करके उसे न केवल घुरा जाता है बल्कि उसे शर्मनाक बातों से व्यवहारों से और आपत्तिजनक तीव्र घावों से अत्याचार किया जाता है! आखिर कहीं भी रखो देखने का नजरिया एक मनोरंजन का साधन मात्र है स्त्री!  कभी लगा शायद लोगों की सोच है जिसे शिक्षा के माध्यम से विचार-परिवर्तन लाया जा सकता है किन्तु जब हाल ही में अमरीका के मरीन फ़ौज में कुछ मर्दों ने अपने सहयोगियों के नग्न चित्रों को फेसबुक में प्रकाशित कर के बुद्धिजवियों की भी धज्जियाँ उड़ाई है ! क्या स्त्री मात्र एक वस्तु है मनोरंजन का? उसके अरमान, उसकी इच्छा, या फिर उसकी अपनी कोई राय या एहमियत नहीं है? एक वक्त था जब स्त्री को सिर्फ उत्पादन का साधन माना जाता था और फिर जब स्त्री अपने पैरों पर खड़ी हुई, अपना बोझ खुद ही सँभालने लगी तब उसे विभिन्न तानों से हतोत्साह किया, कुछ नहीं तो वेश्या या अन्य बातों से ...

किसने कहा था जीना आसान होता है?

Image
ज़िंदगी में गलतियां हो जाती हैं और अक्सर हर कोई गलती करता है। कोई छोटी गलती करके बच जाता है तो कोई बड़ी गलती करके पकड़ा जाता है।   इंसान हैं और इंसानों से ही गलतियां होती हैं।  इंसान इकरार करता है इसीलिए गलती माना भी जानता है, वरना जानवरों की भांति बात होती।  कुछ गलतियां इंसान-इंसान में फरक महसूस करवाता है जैसे की किसी की गलती किसी को बहुत बड़ा अपराध नज़र आता है तो किसी को नहीं! आखिर वजह क्या है ? इंसान गलतियां करता है किसी न किसी कारणवश और वजह सही हो या गलत ये हर कोई अपने ढंग से आँकता है।  कुछ गलती समय की वजह से गलत साबित होते हैं तो कुछ कर्म से ही गलत माने जाते हैं।  काश जीना आसान होता, सोचती हूँ जानवर कैसे जीते हैं? क्या उनका भी एक समाज और कटगराह होता है ? गलतियां जिसकी परिभाषा करने वाले के पास अलग और गलती मनवाने वाले के पास अलग होता है - अभिप्राय! सुना था कुछ लोग केहा रहे थे गलतियां करते जाओ तभी तो सीखोगे :) हम गलती कर बैठे ऐसा कहते हैं और अब हम गुनेहगार हो गए !!! किसने कहा था जीना आसान होता है?  ~ फ़िज़ा 

"प्रकृति का प्रकोप भूमि पर"....

Image
इंसान कभी भी अपनी हरकतों से बाज़ नहीं आएगा शायद इसीलिए इंसान कहलाता है! सबसे अधिक ज्ञानी और समझदार, वरना जानवर नहीं कहलाता? जो वोही करता है जो उस से उम्मीद राखी जाती है ! "प्रकृति का प्रकोप भूमि पर", बस इस वाक्यांश का प्रयोग करते करते वो अपनी हर मुराद पूरी करता है और जब नुक्सान भुगतना पड़ता है तब किसी और का कन्धा खोजता है ! भोपाल गैस कांड २ दिसंबर १९८४ में हुआ था और उसकी वजह तो प्रकृति पर दे दिया किन्तु असल वजह घूसखोरी और भ्रष्टाचार है और आज जो हम चेन्नई की त्रासदी को भी प्रकृति का दोष मान रहे हैं ! आँखें खोल रे इंसान कब तक खुद को और दूसरों को अँधेरे में रखेगा? आखिर अपने ही वंशज को खोएगा क्यूंकि जब वर्षा से बाढ़ आई तब उसने उंच -नीच कुछ नहीं देखा। यहीं सीख ले इंसान स्वर्ग-नरक का खेल यहीं हैं ! छोटा-बड़ा का मोल सबको आखिर एक ही तरह चुकाना पड़ता है - जाग जा इंसान, अपने ही अंत का कारन बन रहा है तू कैसा बुद्धिजीवी है रे? जागो, अन्याय, भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज उठाओ, चंद  सिक्कों के लिए अपनी ही नहीं  सारी  इंसान जाती का सर्वनाश न करो.  ~ फ़िज़ा 

मेरी दरख्वास्त दोस्तों से ... !!!

Image
दोस्तों देश छोड़ दिया लेकिन जहाँ जन्म लिया वहां देश के बारे में सोचना क्यों छोड़ दें? और तो और प्रधानमंत्री ने खुद कहा के पूरा जहाँ हमारा है तो फिर लोग ऐसा दावा क्यों कर रहे हैं के देश की भलाई चाहते हो तो देश में आकर रहो? जितने साल हम देश में थे लड़े और भ्रष्टाचार कर्मचारियों को बेनकाब किया और बिना घूसखोरी के अपने काम पूरे किये। इतने बड़े देश का एक तिनका होनेके बावजूद हमने अपना कर्म और धर्म निभाया - यहाँ धर्म इंसानियत है ! मुझे मेरे सभी साथियों से यही कहना है की आप लोग जो समर्थन कर रहे हैं मुझे - सामने आकर या फिर सन्देश भेजकर उन सभी को मैं तहे-दिल से शुक्रिया कहना चाहती हूँ। और मैं ये भी कहना चाहती हूँ के दोस्तों यदि किसी कारणवश आप डरते हैं की मुझ से सहमत होने से आपको अपनी छवि (इमेज) ख़राब होती है या बेनकाब हो जाते हो तो आप कृपया करके सहमति न दीजिये और साथ न दीजिये - मुझे इस बात का कतई बुरा नहीं लगेगा। स्वंत्र भारत में पैदा हुई हूँ मैं और महाराष्ट्र के राष्ट्रीय रक्षा अकादमी में पली  बड़ी हूँ इस करके भी दिल की बात कहना और अपनी बात स्पष्ट रूप से कहने का हक़ रखती हूँ।  हमारे बाल ...

एक शाम सर्कस के नाम .... :(

Image
बचपन में माता-पिता और भैया के साथ सर्कस देखने जाया करते थे।  उन दिनों परिवार के साथ बहार जाना, घूमना, शॉपिंग करना और मनपसंद का खाना होटलों में खाना जैसे की बस एक दिन में पूरी ज़िन्दगी जी लेने समान होता था. तब सर्कस में करतब दिखने वाले जानवर हों या फिर इंसान सभी खूब पसंद आते थे और कर्तबगारी दिखने वाला भी बलवान और पहलवान नज़र आता था. बचपन तो आखिर बचपन होता है जहाँ सही -गलत, अच्छे -बुरे की पहचान नहीं होती थी और न ही हमारे ज़माने में इतनी जानकारी होती थी जो आजकल के युग में बच्चों को मिलती है. काफी सालों बाद हम कुछ मित्रों के संग सर्कस देखने गए. सर्कस की बात करते हैं तो जैमिनि सर्कस याद आता है काफी मशहूर रहा है भारत में अपने समय में. खैर अमेरिका में तो फिर चकाचौंध की दुनिया है काफी सजीला और तर्कब्दार माहोल था और एक से एक स्त्री-पुरुष करतब दिखा कर लोगों का मनोरंजन करते रहे और फिर वो वक़्त भी आया जब हाथी घोड़े और ऊँट भी आये फिर चीते भी आये… हर एक हंटर की आवाज़ पर जानवर कठपुतली की तरह रिंग मास्टर के इशारों पर नाचता लोग तालियां बजाते और रिंग मास्टर ज़मीन पर हंटर मारता। ...

मृत्यु दंड, ये एक सजा है या फिर हत्या करने का एक तरीका ?

Image
मृत्यु दंड, ये एक सजा है या फिर हत्या करने का एक तरीका ? मेरा मानना है की किसी भी जीव की हत्या, हत्या होती है और इसे किसी भी रूप में पनपने या सराहने नहीं देना चाहिए ! जानवर हो या इंसान जीवन तो सबका एक सामान होता है, फिर आपको या हमको या किसी भी जगह के नियम को क्या हक़ है किसी को भी मृत्यु दंड देने का ? जीवन देना और लेना कभी भी इंसानी हक़ में नहीं है ! यहाँ तक की आत्महत्या भी एक अभिशाप है, ये गलत है - ऐसा मेरा मानना है।  किसी भी द्रोही हो या निरद्रोही कानून के फैसले होने तक क्या पता किसकी जान ले ली गयी है निर्मोही मृत्यु दंड के तहत. अपराधी को दंड दो परन्तु मृत्यु दंड नही. इसका खंडन मैं करती हूँ इस लेख द्वारा क्यूंकि हमें अपराध से घृणा होनी चाहिए न के अपराधी से क्यूंकि ये इंसान ही है और हम और आप भी इंसान हैं और ग़लतियां या गुस्ताखियाँ हम सब से हो सकतीं हैं - मानव त्रुटि के तहत मृत्यु दंड बहुत ही नाइंसाफी है और इंसानी भाषा में इसे महज़ हत्या करना है ! दंड से भय पैदा होता है और भय से इंसान की मानसिक रूप से गलत प्रभाव पड़ता है. इंसान का मन बदलना चाहिए और उसके लिए जो प्रयास हो सके वही...

ये मैं नहीं अनुभव कहता है ;)

Image
कल्पना के घोड़े भी दौड़ना क्या दौड़ना है, एक पल आप हवा में तो एक पल पाताल में ! ऐसे में एक सय्यम बरतना कितना ज़रूरी हो जाता है।  कल्पना जितना हमें सुलझाने में मदत करती है उतनी ही उलझने में भी कामियाब होती है।  ये अनुभव कहता है, मैं नहीं हा हा हा।   अक्सर कल्पना की वजह से हौसले का बुलंद होना और न होना बहुत हानिकारक हो सकता है।  रिश्ते में दबाव तो कभी दरार पैदा हो सकता है।  इसीलिए कल्पना रुपी पतंग को जोर का हवा चलते वक़त न उड़ाएं शायद पतंग तुम्हें भी उड़ा ले जा सकती है - ये मैं नहीं अनुभव कहता है :)

एक-दूसरे को इंसान समझिये और हैवानो को इंसान बनाइये ना के उन्हें मिटाकर खुद हैवान बन जायें!

Image
शिक्षा केहते हैं इंसान का ज्ञान बढ़ाते हैं और तो और अज्ञानता को दूर करता है . बहुत हद्द तक मेरा भी मानना यही था तब तक जब तक के मैने पढ़े-लिखे लोंगों को सभ्यता से पेश आते देखा है. जैसे जैसे जीवन को करीब से देखने का अवसर मिला है तो यही देखा है की पढ़े-लिखे और अनपढ़ लोगों में ज्यादा फरक नहीं है बल्कि कई बार अनपढ़ को फिर भी इंसानियत का ज्ञान होता है, लेकिन मैने पढ़े-लिखे लोगों को अज्ञानता से भरे और हैवानियत से भरी बातें और कर्म करते हैं सुना है और ये खुले आम होते देखने के बाद इंसानियत से विश्वास जैसे टूट सा गया है. जानवर से यदि हम सीखें तो बहुत कुछ हम अब भी अपने दायरे में रेहा सकते हैं. आज इंसान इसी होड़ में लगा है के वो किस हद्द तक अपने स्तर से गिर सकता है ताके इंसानों से क्या अपने आने वाली कई पीड़ियों से वो नज़र नहीं मिला सकता. बचे कुचे इंसानो को ये देखकर चुप नहीं रेहाना है बल्कि इसके विरूध आवाज़ उठानी है और आम जनता में इसकी जागरूकता लानी है  एक-दूसरे को इंसान समझिये और हैवानो को इंसान बनाइये ना के उन्हें मिटाकर खुद हैवान बन जायें! 

ज़िंदगी में अपनी पेहचान बनाना सीखो ना की किसी की पेहचान से लटक कर उनकी दूम बन जाओ ;)

Image
ज़िंदगी में कभी किसी को भी आप कितना भी चाहो या पंसंद करो मगर जिस बात से आप वाक़िफ़ ना हो या फिर जिस बात को आप नहीं मानते हो तो उस बात पर टिके रहो। जसबाती होने से राय नहीं बदलना चाहिये. अपनी राय या अपनी सोच अपनी होती है और ये अपने होने का भी एक सबूत है . जैसे के मैं बापू को मानती हूँ लेकिन बापू के हर बात को मैं नहीं मानती और जिस बात को मैं नहीं मानती में उसका समर्थन भी नहीं करती. बापू जब केहते हैं अस्पृश्यता एक अभिशाप है तो मैं मानती हूँ और कबूल करती हूँ लेकिन वहीं जब बापू केहते हैं के कोई एक गाल पर मारे तो दूसरा गाल भी हाज़िर कर दो - इस बात को मैं नहीं मानती और इसका समर्थन भी नहीं करती। ज़िंदगी में अपनी पेहचान बनाना सीखो ना की किसी की पेहचान से  लटक कर  उनकी दूम बन जाओ.  अपने होने का दम भरो और स्वाभिमान से जियो, होसले के साथ जियो !

दूसरों से ईर्ष्या करने से अच्छा दूसरों की अच्छी बातें क्यूं नहीं अपना लेते?

Image
ज़िंदगी में अगर कोई आपसे ज्यादा सयाना हो तो उसमें उस इंसान से ईर्ष्या मत करो. उसके साथ रेहकर कुछ सीखो या फिर ये मान लो के आप उस काबिल नहीं हो और उनकी इज्जत करना सीखो. इस से हर किसी का भला ही होगा. यदि आप ईर्ष्या करने लगे तो साजीग है की आपकी उनसे ज्यादा अच्छी बनेगी भी नहीं और बेवजह आप एक अच्छा इंसान की दोस्ती को खो दोगे. इससे नुकसान आपका ही होगा क्यूंकि कुछ अच्छा सीखने का और अच्छी दोस्ती को - दोनो का ही अवसर आपने खो दिया।  सुना है शक भी एक ऐसी ही बुरी बला का नाम है। बेवजह अपने मन के विकृत खयालात को पनपने ना दें इस से आप के अंदर की कमजोरी ही नज़र आती है और सामने वाला इंसान कुछ नहीं जानते हुये अपनी ज़िंदगी जीता है। ऐसे में आप एक अच्छे दोस्त को खो भी सकते हैं हमेशा के लिये  कभी भी अपने दिल के विकृत खयाल को पनपने देने से पेहले एक बार अपने दिल में टटोलकर -जांच कर लेनी चाहिये ताके बात का बतंगड ना बने और आप औरों के सामने मज़ाक की वस्तु ना बनें. ईर्ष्या से आप अपना अस्तित्वा खो बैठेंगे और इसके जिम्मेवार आप खुद होंगे !

बेहते पानी को कौन रोक सका है? हो सके तो बेहा चलो मगर उसे रोकने या टोकने की कोशिश ना करो....

Image
बेहते पानी को कौन रोक सका है? हो सके तो बेहा चलो मगर उसे रोकने या टोकने की कोशिश ना करो. मैं बात कर रही हूँ उस पल की जब इंसान किसी खुशगवार या ज़िंदादिल इंसान को देखकर लालस रखता है के काश मैं भी इनके संग दो पल जी लूँ ताके ज़िंदगी जीने का एहसास और वो खुशी दोनो ही हासिल हो जाये मगर ये भूल जाते हैं के इसे बांध के रखोगे तो ये आपका नहीं रहेगा जितना खुला छोड़ोगे उतना ही फासला काम होगा . जिसका स्वभाव बेहते पानी की तरह हो उसे बेहने देना चाहिये और क्यूं नहीं उसकी प्रवृति और उसकी स्वतंत्रता ही है जो उसके अंदर के इंसान को जगाये रखता है जैसे ही हम रोक-टोक करते हैं उसकी प्रवृति में फरक पड़ता है और जो सबसे ज्यादा पसंदीदा इंसान माना जाता था वोही इंसान इंसान ना रेहाकर हेवान बन जाता है क्यूंकि किसे अपनी आज़ादी गवारा नहीं?  बेहते पानी को बेहने दो, देखना ये चाहिये के क्या तुम बेहा सकते हो उसके साथ? गर नहीं तो कोशिश कीजिये मगर बेहती रफ़्तार को कम करने की कोशिश कभी ना कीजिये.... ये सभी के भले के लिया है ... 

प्यार करें मगर निस्वार्थ...!

Image
ज़िंदगी में तो सभी मोहब्बत करते हैं मगर मोहब्बत को कौन मोहब्बत करता है ? है ना बेचइदा सवाल.... लगना भी चाहिये क्युंके जो मोहब्बत से ना करे मोहब्बत वो क्या जाने मोहब्बत का मोल. जो मोहब्बत या प्यार देखने मिलता है वो सिर्फ एक स्वार्थी प्यार है जी हाँ ये प्यार स्वार्थी इसीलिये है क्युंके आपको कोई अच्छा लगता है इसीलिये आप उनपर जान लुटाते हैं मगर हक़ीक़त मैं मोहब्बत है? सोचिये यदि कोई दीखने में सुन्दर और आकर्षक ना होकर उसकी अच्छाइयों को जानकर और समझकर उस से प्यार किया जाये तो कोई मतलब भी रेहता है क्युंके सुंदरता हमेशा साथ नहीं देती तो क्या आप अपने प्यार को बदलते रहेंगे ? है ना बेचइदा सवाल ;)  दुनिया में हज़ारों मिलेंगे जो आप पर जान लुटायेंगे मगर कोई नहीं होगा जो आप पर सही अर्थ में मरमिटेगा क्युंके उनका प्यार स्वार्थी है और प्यार कभी भी निस्वार्थी होता है - सोचिये  माँ का प्यार सच्चा और निस्वार्थ होता है? यदि वो  माँ निस्वार्थी है तो वो ना तो अपने  बच्चों से ना ही अपने पति से या किसी भी व्यक्ति से किसी भी बात की उम्मीद रखेगी - इसका मतलब इंसान को नीयत से ही निस...

क्या आपने कभी मोहब्बत किया है?

Image
कभी मोहब्बत मत करना क्युंके इसे करने के कयी नुकसान हैं जैसे की दिल का मचलना, सांसों का अत्यधिक ज्यादा तेज़ चलना तो कभी बहुत धीरे चलना, हर पल ऐसा एहसास होना के सीने पर बहुत भरी-भरकम समान जी हाँ गुलज़ार साहब की नज़्म की तरह "कुछ समान " मिलने पर दिल का ना खुल पाना और ना मिलने पर जो बैचेनी उफ्फ़ ... या अल्लाह कोई मौत ही देदे तो क्या गम है लेकिन वो भी तो इतनी आसानी से नहीं मिलती  क्या आपने कभी मोहब्बत किया है? और जवाब हाँ है तो ज़रूर बताईयेगा अपनी व्यथा।.. 

ईर्ष्या सिर्फ इंसान के अंदर की असुरक्षा है ...

Image
ज़िंदगी में किसी से ईर्ष्या करने से क्या फायदा करना ही है तो अच्छे गुणो को अपनाओ जिस से खुद भी तारीफ के काबिल बनो वर्ना ईर्ष्या से दुश्मनी और कड़वाहट ही पैदा होती है और ये आग जब फैलती है तब इसे किसी भी तरह रोका नहीं जा सकता। सब कुछ नष्ट हो जाता है और जब तक पता चले बहुत देर हो जाती है। इंसान अगर इंसान से ही नफरत और द्वेष  की भावना रखे तब वो तो जानवर के भी काबिल नहीं रेहता - अफसोस !

मर्द भी पीड़ित हैं आज की नारी से जिसे कभी हम अबला समझते थे ....!

Image
ज़िंदगी में बहुत कम समय में बहुत कुछ सीखने और समझने का मौका मिला। कयी बार हम देखते हैं लोगों के रवैये कभी कुछ तो कभी कुछ लेकिन इसी रवैये को आप दो तरीके से देख सकते हैं या भांप सकते हैं और वो ये के शायद ये प्यार से हक दीखाने का नज़रिया है या फिर कहें तो वाक़ई तकलीफ देने के इरादे से ही है . मैने औरतों को समय समय पर मौके का फायदा उठाते देखा है जब में ये केहा रही हूँ तब ये नहीं केहा रही के आदमी सब शरीफ हैं :) , ना ऐसा नहीं लेकिन हम औरतें भी कुछ कम नहीं हैं मौका देखा नहीं अपने फायदे के अनुसार हम अच्छे बनेंगे या फिर बुरे।  मेरी बात तो कुछ ऐसी है के कभी किसी से कुछ उम्मीद ही नहीं रखी जो भी रखा अपने पिताजी से ही रखा और जैसे ही उनके सर से जिम्मेदारी खत्म होकर आत्मनिर्भर का समय आया तो किसी और पर निर्भर होने की लालसा भी नहीं रही। मुझे लगता है किसी पर इतना निर्भर होना और वो भी बेफिक्र होकर तो पिता से बढ़कर एक लड़की के लिये कौन हो सकता है। लेकिन दुनिया में ऐसे भी औरतों को देखा है जो पिता का स्थान खत्म होते ही पति के सर चड़ जाते हैं के मुझे ये चाहिये वो चाहिये महल चाहिये बड़ा घर, तो कभी ज़ेव...

सच्चा होना गुनाह है ...

Image
सच्चा होना गुनाह है ये जानकर मेरे अंदर का एक बहुत बड़ा हिस्सा मर सा गया आज. कहाँ सुना था सत्य मेव जयते लेकिन दुनिया सिर्फ वोही सुनना चाहती है जो वो सुनना चाहते हैं. बात मेरे पिताजी की याद आई के ज़िंदगी में दो तरह के लोग मिलेंगे एक जो तुम्हारी सच्ची बातें सुनकर भी तुम्हारा साथ देंगे और दूसरे तुम्हारी सच्ची बातें सुनकर तुम्हें अपना दुश्मन समझेंगे. जो दोस्त बन जायें वो हमेशा के लिये होंगे लेकिन जो दुश्मन होंगे उनसे सतर्क रेहना क्युंके वो सच का साथ देने वालों के दुश्मन हैं . मुझे लगता था इंसान सच और झूठ का साथ देता है और उसे इंसान के साथ और झूठे होने से वर्क नहीं पड़ता क्युंके बापू भी कहा करते थे के पाप से घृणा करो पापी से नहीं। खैर, दिल को धक्का लगा के अपने बारे में ये जानकर के मैं  ज़रूरत से ज्यादा सच बोलती हूँ और ये ठीक नहीं है  वाक़ई गलत तो मैं ही हूँ ना, जो सच बोलती हूँ और आंख में आंख डालकर सच बोलती हूँ बिना किसी झिझक के या भय के.  जब एक इंसान ज़रूरत से ज्यादा सच बोलता है तो दुनिया उसका मुंह बंद कर देती है -  हर उठते हुये का गिरना भी पड़ता है, लेकिन गिराता क...

प्यार की कोई सीमा नहीं होती और ना ही कोई नियम....

Image
एक था मोटा और एक थी मोटी उन दोनो की एक खास बात ये थी के दोनो ही मोटे नहीं थे, लेकिन वो के दूसरे को प्यार से इसी तरह संबोधित करते. मोटा जब मोटी से बात-चीत के कमरे में मिला (छट - रूम) तब वे दोनो ये नहीं जानते थे के उन्हें यहाँ उनका अपना कोई मिलेगा क्यूंकि ऐसी कोई उम्मीद से नहीं आये थे वो यहाँ. सिर्फ एक वक़्त गुज़ारने का साधन था लेकिन उस रात ऐसी बात नहीं थी। दोनो एक दूसरे को जानते भी नहीं थे और मोटा - पंजाबी मुंडा के नाम से आया था और मोटी पंजाबी कुडी के नाम से आई थी जो भी दोनो ने जो अंताक्षरी में बात-चीत शुरू की के कब सुबहा के २ बजे इसका दोनो को ही अंदाज़ा नहीं लगा बस फिर क्या था पंजाबी मुंडे ने जाते-जाते पंजाबी कुडी से एमआईल अड्रेस लेलिया और बस ज़िंदगी भर का रोग या फिर नाता बना लिया। मुंडा लम्बी - लम्बी चिट्ठी लिखता और अंग्रेजी के गाने लिख कर भेजता. पंजाबी कुडी ये सब पढ़कर खुश होती खासकर इसीलिये की ये सब उसके पसंदीदा गानो में से एक होते और उसे ताज्जुब होता की मुंडे को ये सब कैसे पता के उसकी पसंद क्या है? खैर जो भी हो दोनो चिट्ठियों से बोर होकर जल्द ही फोन की दुनिया में आये और बस फिर क्या...

प्यार क्या होता है?... कुछ बात मेरी मां की

Image
प्यार क्या होता है? .... क्यूं होता है, इसका जवाब कभी भी किसी से भी नहीं मिला मुझे आज तक ... मगर हाँ, प्यार क्या होता है? प्यार ज़रूरी नहीं के केहाकर ही होता है. कई बार प्यार जो के एक एहसास होता है, उसे समझना भी होता है और सही अर्थ में प्यार के इस एहसास को समझने वाला ही प्यार के लायक भी होता है। आज अनायास मैं गाड़ी चलाकर बाज़ार जा रही थी जब खयाल आया ... कुछ बात मेरी मां की.  मेरी मां, सख्त है अर्थपूर्ण नहीं है वो कभी भी किसी को भी कोई बात केहाकर नहीं जताती यहाँ तक के अपने बच्चों से भी कभी ये नहीं कहा के उन्हें  प्यार है बल्कि उनकी हर वो बात जो हमसे सम्बंधित होती हैं उनका पूरा-पूरा ध्यान रखा है. लेकिन खास आज मैं ये केहना चाहती हूँ के मेरी मां आजीवन अब तक शाकाहारी रही हैं मगर मेरे पिता मांसाहारी रहे हैं और बेहद पसंद करते हैं जब मेरी मां बनाती हैं - जी हाँ, ताज्जुब है ना? आज मुझे उस समय की जोड़ी के बारे में बताना है जो के आज के पीढी के नहीं हैं लेकिन उनके प्यार करने का अंदाज़ भी निराला है। मेरी मां शाकाहारी होने के बावजूद मेरे पिताजी के लिये मांसाहारी भोजन बनाती है , मेने क...

अफसोस कब वो दिन आयेंगे....

Image
त्योहारों का देश है हमारा भारत और उसकी संस्कृति की शान उसके लोगों से है जो इन्हें मनाते हैं . पौराणिक काल में मंदिर ही ऐसे जगह होते थे जहां सामूहिक तौर पर लोग मिलते और खुशियाँ मनाते जिसका धर्म से कोई सम्बंध नहीं होता, दीवाली श्री राम के आगमन की खुशी में मनाते हैं तब भी चाहे हिन्दू हो या मुसलमान, ईसाई हो या फिर सिख, जैन हो या बुध - सभी एक होकर त्योहार मनाते, मिठाईयों का आदान प्रदान करते. ठीक ईद के समय भी हर किसी जाती-प्रांत के लोग सेवाई खाने की इच्छा में मुसलमान भाई के घर ज़रूर हो आता या आती. त्योहार हमारी संस्कृति को ही नहीं बल्कि हमारे लोगों में भाई-चारा और दोस्ती का मेल-जोल बढ़ाते हैं. लेकिन अब का ज़माना वाक़ई कलयुग से भी बढ़कर है जहां आस्तिक हो या फिर नास्तिक हर किसी ने नाम में दम कर रखा है . हर त्योहार को ईश्वर, अल्लाह नानक बताकर उसकी विवेचना करते और फिर क्या है  नास्तिक वहां मचल पड़ता है और बस हर कोई अपने को सही बताने और जताने की होड़ में लगा है। कब रुकेगा ये सब, कब होगा इसका अंत क्युंके जो वाक़ई में त्योहारों से बहुत कुछ जोड़ता है अपने जीवन से, बचपन से, अपने साथियों से उन...