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ज़िंदगी बहुत छोटी है दोस्ती से इसे खुशनुमा करो ना के दुश्मनी से ...!

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आज अनायास ऋषब की याद आई - हाँ बात है तो कयी साल पुरानी जब ११ वीं कक्षा में मैं पढ़ती थी और ऋषब शायद छोटी कक्षा में था मगर था हूमसे भी उम्र में बड़ा. ऋषब था बड़ा नेक बच्चा मगर थोड़ा लड़कपन तो थोड़ी अकड़ भी थी उसमें अभी. कभी किसी अध्यापिका की डांट पड गयी तो कभी किसी दूसरे बच्चों ने शिकायत लगा दी जो भी हो ऋषब के दिन बहुत बुरे होते थे. जाने मेरी मुलाकात किधर हुई मगर ऋषब बड़ी इज्जज़त से पेश आता था मुझ से. एक दोस्त की हेसियत हमेशा खयाल रखता था चाहे फिर वो उसकी उम्र का हो या फिर उस से कम उम्र हो या फिर बुज़ुर्ग ही क्यूं ना हो।  एक दिन ऋषब हमारी कक्षा में कुछ लड़कों के साथ बातें करते - करते किसी की पेन्सिल बॉक्स से ब्लेड लेकर खेलने लगा और उसे तोड़कर-मरोड़कर  वहीं  कहीं छोड़कर चला गया। हमारी कक्षा के विद्यार्थी  खेलने  के बाद अगली विषय की पढ़ाई के लिये कक्षा में पधारे. कक्षा में अध्यापिका भी आगयीं थी इस वजह से जो जहां जगह पा सका वहीं बैठ गया और अध्यापिका को सुनने में लीन हो गया. श्रीमती सिन्हा थी हमारी अध्यापिका जो के  हमें   जीव-विज्ञान...

प्यार क्या होता है?... कुछ बात मेरी मां की

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प्यार क्या होता है? .... क्यूं होता है, इसका जवाब कभी भी किसी से भी नहीं मिला मुझे आज तक ... मगर हाँ, प्यार क्या होता है? प्यार ज़रूरी नहीं के केहाकर ही होता है. कई बार प्यार जो के एक एहसास होता है, उसे समझना भी होता है और सही अर्थ में प्यार के इस एहसास को समझने वाला ही प्यार के लायक भी होता है। आज अनायास मैं गाड़ी चलाकर बाज़ार जा रही थी जब खयाल आया ... कुछ बात मेरी मां की.  मेरी मां, सख्त है अर्थपूर्ण नहीं है वो कभी भी किसी को भी कोई बात केहाकर नहीं जताती यहाँ तक के अपने बच्चों से भी कभी ये नहीं कहा के उन्हें  प्यार है बल्कि उनकी हर वो बात जो हमसे सम्बंधित होती हैं उनका पूरा-पूरा ध्यान रखा है. लेकिन खास आज मैं ये केहना चाहती हूँ के मेरी मां आजीवन अब तक शाकाहारी रही हैं मगर मेरे पिता मांसाहारी रहे हैं और बेहद पसंद करते हैं जब मेरी मां बनाती हैं - जी हाँ, ताज्जुब है ना? आज मुझे उस समय की जोड़ी के बारे में बताना है जो के आज के पीढी के नहीं हैं लेकिन उनके प्यार करने का अंदाज़ भी निराला है। मेरी मां शाकाहारी होने के बावजूद मेरे पिताजी के लिये मांसाहारी भोजन बनाती है , मेने क...

अफसोस कब वो दिन आयेंगे....

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त्योहारों का देश है हमारा भारत और उसकी संस्कृति की शान उसके लोगों से है जो इन्हें मनाते हैं . पौराणिक काल में मंदिर ही ऐसे जगह होते थे जहां सामूहिक तौर पर लोग मिलते और खुशियाँ मनाते जिसका धर्म से कोई सम्बंध नहीं होता, दीवाली श्री राम के आगमन की खुशी में मनाते हैं तब भी चाहे हिन्दू हो या मुसलमान, ईसाई हो या फिर सिख, जैन हो या बुध - सभी एक होकर त्योहार मनाते, मिठाईयों का आदान प्रदान करते. ठीक ईद के समय भी हर किसी जाती-प्रांत के लोग सेवाई खाने की इच्छा में मुसलमान भाई के घर ज़रूर हो आता या आती. त्योहार हमारी संस्कृति को ही नहीं बल्कि हमारे लोगों में भाई-चारा और दोस्ती का मेल-जोल बढ़ाते हैं. लेकिन अब का ज़माना वाक़ई कलयुग से भी बढ़कर है जहां आस्तिक हो या फिर नास्तिक हर किसी ने नाम में दम कर रखा है . हर त्योहार को ईश्वर, अल्लाह नानक बताकर उसकी विवेचना करते और फिर क्या है  नास्तिक वहां मचल पड़ता है और बस हर कोई अपने को सही बताने और जताने की होड़ में लगा है। कब रुकेगा ये सब, कब होगा इसका अंत क्युंके जो वाक़ई में त्योहारों से बहुत कुछ जोड़ता है अपने जीवन से, बचपन से, अपने साथियों से उन...